क्यों आज के सलामी बल्लेबाज़ वीरेन्द्र सहवाग से अलग हैं?

Why openers today are not like Sehwag

3 जनवरी 2017 को सिडनी क्रिकेट ग्राउंड पर दोपहर के करीब 12:30 बजे का समय है। डेविड वार्नर ने वहाब रियाज़ की गेंद को बैकवर्ड प्वाइंट पर कलाइयों के सहारे मोड़ दिया है और आसानी से तीन रन लेते हुए और हवा में उछल के वो मुट्ठी लहराते हुए दिखाई देते हैं। इस तरह से टेस्ट मैच की पहली सुबह, दोपहर के भोजन से पहले शतक लगाने वाले वह केवल पांचवें बल्लेबाज बन गए हैं।

उस वक़्त वार्नर 100 गेंदों में 78 रन बना कर खेल रहे थे और वह 17 चौके लगा चुके थे। दूसरे छोर पर, मैट रेंशाव, उनके सलामी जोड़ीदार, ने उनसे दो अधिक गेंदों का सामना करते हुए दो चौकों की मदद से 21 रन बनाए थे।

वार्नर 95 गेंदों में 113 रन बना कर लंच के बाद छठे ओवर में आउट हो जाते हैं। रेंशाव दूसरी सुबह के छठे ओवर तक बल्लेबाज़ी करते हैं, और वह 293 गेंदो में 184 रन बनाकर आउट होते हैं।

वार्नर (उम्र 30 वर्ष) और रेंशाव (उम्र 20 वर्ष), दोनों बाएँ हाथ के बल्लेबाज़ हैं और दाएँ हाथ से गेंदबाज़ी करते हैं। लेकिन जिन रास्तों पर चल कर दोनों ने ऑस्ट्रेलियाई टेस्ट टीम तक का सफर तय किया है, वो बिल्कुल अलग हैं। एक भी प्रथम श्रेणी क्रिकेट मैच खेलने से पहले ही वार्नर ने ऑस्ट्रेलिया के लिए अपने टी20 करियर की शुरुआत कर दी थी। रेंशाव ने 14 प्रथम श्रेणी मैचों में खेलने के बाद टेस्ट क्रिकेट में पदार्पण किया, लेकिन अभी अंतरराष्ट्रीय या घरेलू स्तर पर उन्होंने कोई भी टी20 मैच नहीं खेला है।

टी20 बहुल क्रिकेट के परिदृश्य में अगर देखें तो पहली नज़र में रेंशाव एक विसंगति के रूप में प्रतीत होते हैं और वार्नर टेस्ट मैचों के सलामी बल्लेबाज़ो के अग्रणी के तौर पर दिखेंगे। हालांकि ऐसा नहीं है। दुनिया के ज़्यादातर टेस्ट टीमों की शुरुआत अब उन बल्लेबाज़ों से होती है जो अपने देश की टी20 टीम का हिस्सा बनने के लिए पहली पसंद नहीं हैं। जैसे कि एलिस्टेयर कुक और हसीब हमीद, टॉम लैथम और जीत रावल, क्रेग ब्रेथवेट और लियोन जॉनसन, स्टीफन कुक और डीन एल्गर, दिमुथ करूणारत्ने और कौशल सिल्वा,अजहर अली और समी असलम।

इन 12 खिलाड़ियों में से दस ने अपने देश के लिए कोई टी20 मैच नहीं खेला है। अन्य दो : एलिस्टेयर कुक और लैथम ने नवंबर 2015 के बाद से कोई टी20 मैच नहीं खेला है। ब्रेथवेट, जो की 2009 से प्रथम श्रेणी बल्लेबाज़ हैं और हमीद और रेंशाव, सभी ने अभी तक प्रथम श्रेणी में कोई भी टी20 मैच नहीं खेला है।

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इसके परिणामस्वरूप, टेस्ट क्रिकेट में सलामी बल्लेबाज़ी का ढांचा पूरी तरह से बदल गया है।

इस शताब्दी के दस सबसे शानदार सलामी बल्लेबाजों में से आठ ने 50 या उससे अधिक की स्ट्राइक रेट से रन बनाए हैं। इनमें से चार – वीरेंद्र सहवाग, वार्नर, क्रिस गेल और मैथ्यू हेडन ने 60 से ज्यादा की दर से रन बनाए हैं।

हमें लगने लगा था कि सहवाग, गेल, हेडन और तिलकरत्ने दिलशान, ने शीर्ष क्रम में उनके आक्रामक रुख से टेस्ट क्रिकेट को हमेशा के लिए बदल दिया है।लेकिन मामला ये नहीं है।

नयी पीढ़ी के बल्लेबाज़ “गेंद को देखो और स्ट्राइक करो” के सिद्धांत से पीछे हट कर “गेंद को ध्यान से देखो” के सिद्धांत पर वापस चले गए हैं। 2015 की शुरुआत के बाद 10 सर्वश्रेष्ठ सलामी बल्लेबाजों में से केवल वार्नर और मार्टिन गुप्टिल ने 50 से ज्यादा की स्ट्राइक रेट से रन बनाए हैं।
आकाश चोपड़ा के अनुसार, जो भारत के पूर्व सलामी बल्लेबाज थे, दुनिया भर में टीमों की कोशिश है कि उनके शुरुआती क्रम में दृढ़ता आये जिससे बल्लेबाज़ी क्रम के धराशायी होने की समस्या से निजात पाई जा सके।

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David Warner Australia
David Warner Australia

“मुझे लगता है कि तकनीक के साथ हाल के दिनों में एक छोटा सा समझौता किया गया है,” वह कहते हैं। बल्लेबाज़ी क्रमो के धराशायी होने की संख्या अविश्वसनीय है – अगर पिच में कुछ भी है, तो आप विकेटों का लगातार पतन देखेंगे । अगर कुछ भी असाधारण है, तो एक समस्या खड़ी हो जाती है। तो हो सकता है कि टीमों को ये एहसास हो रहा है कि उन्हें बेहतर कौशल वाले सलामी बल्लेबाज़ों की आवश्यकता है।”

यह देखते हुए कि टेस्ट क्रिकेट में पारी का आगाज़ करने के लिए आवश्यक तकनीक ,टी -20 के लिए आवश्यक तकनीक से बहुत अलग है, चोपड़ा का कहना है कि बल्लेबाजों को एहसास हो गया है कि उन्हें बेहतर स्वरूप में अच्छा करने के लिए उपयुक्त विशेषज्ञता हासिल करनी ही होगी।
“मुझे लगता है की अब वो समय आ गया है जब लोगों को एहसास होने लगा है कि एक टेस्ट सलामी बल्लेबाज़ के रूप में, मैं टेस्ट ही खेलने जा रहा हूँ और मैं टी20 क्रिकेट नहीं खेल सकता हूँ। और जो लोग टी20 क्रिकेट खेल रहे हैं वे केवल टी20 ही खेलने जा रहे हैं और इसमें कोई भी अपवाद नहीं होगा। केएल राहुल, एक अपवाद हैं क्योंकि आज के परिदृश्य में वो एक इकलौते ऐसे बल्लेबाज़ हैं जो किसी प्रारूप में फिट हो सकते हैं।

“मुरली विजय जैसे खिलाड़ियों ने मुझे लगता है मन बना लिया है कि टेस्ट क्रिकेट ही मेरी पहली प्राथमिकता है, बाकी सब अपनी जगह है। टॉम लैथम के साथ भी वही मामला है। वह भी टेस्ट क्रिकेट को सर्वाधिक प्राथमिकता देने वाले बल्लेबाज़ों में से एक हैं।”
वहीं ऐसे समवर्ती सलामी बल्लेबाज़ भी हैं जो केवल छोटे प्रारूप का क्रिकेट खेलते हैं जैसे जेसन रॉय, जॉनसन चार्ल्स और आरोन फिंच। गुप्टिल और एलेक्स हेल्स जो की टी20 की धारा से टेस्ट की तरफ आये हैं, उन्होंने टेस्ट क्रिकेट में खुद को सही तरीके से अभिव्यक्त करने में काफी संघर्ष किया है। इंग्लैंड ने हेल्स को बाहर का रास्ता दिखा दिया जब उन्होंने अपने पहले 11 मैचों में केवल 27.28 की औसत और 43.84 के स्ट्राइक रेट से रन बनाए।
एड्रियन बराथ, फिलिप ह्यूज, हामिश रदरफोर्ड, शिखर धवन उस समूह का हिस्सा हैं जिन्होंने आक्रामक बल्लेबाज़ी से अपने टेस्ट करियर को एक ठोस शुरुआत तो दी पर किन्ही कारणों से एक निरंतर प्रभाव नहीं छोड़ सके और उनकी पीढ़ी से केवल वार्नर और तमीम इकबाल ही ऐसे हैं जो खुद को एक नियमित खिलाड़ी के रूप में स्थापित करने में कामयाब हो सके हैं।

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Alastair Cook England
Alastair Cook England

यह हो सकता है की सहवाग और गेल का टी20 आगाज़ देर से हुआ और तबतक वो खेल के लंबे प्रारूप में खुद को स्थापित कर चुके थे। खेलने की उनकी शैली टी20 की शैली से भली भांति मेल खाती थी।उनके बाद की पीढ़ी को खुद को स्थापित करने से पहले टी20 की शैली में ढलना पड़ा था।

चोपड़ा आशा करते हैं कि अगली पीढ़ी के बल्लेबाज़ और आसानी से खुद को अलग अलग प्रारूपों में ढाल सकेंगे और राहुल – जिन्होंने सभी प्रारूपों में भारत के लिए सैकड़े बनाए हैं – को वो आने वाली पीढ़ी के सलामी बल्लेबाजों के अगुवा के रूप में देखते हैं।

“यह एक प्रक्रिया है। और हर नियम के अपवाद भी होते हैं,” चोपड़ा कहते हैं। “मैं हर बार केएल राहुल का उल्लेख कर रहा हूँ क्योंकि वो आधुनिक समय के बल्लेबाज़ हैं। लेकिन कभी कभी हम विकास की प्रक्रिया को नजरअंदाज कर देते हैं, हमें विश्वास हो जाता है कि जो हो रहा है वही हो सकता है। लेकिन कुछ खिलाड़ियों ने खुद को इतना विकसित किया है कि एक टेस्ट सलामी बल्लेबाज आसानी से एक वनडे या टी20 मैच में सलामी बल्लेबाज की भूमिका निभा सकता है।”

“और हर कोई सहवाग नहीं बन सकता है। अन्यथा के एल राहुल भी एक योग्य और मंझे हुए बल्लेबाज़ हैं।”

चोपड़ा का कहना है कि विजय दृढ़ तकनीक के साथ-साथ बड़े हिट लगाने की क्षमता होने के कारण राहुल के समान ही हैं, लेकिन राहुल – जिन्होंने विजय के बाद पदार्पण किया- की तुलना में उन्हें अलग अलग प्रारूपों के बीच खुद को समायोजित करने में ज्यादा परेशानियों का सामना करना पड़ा है।

“स्वभाव से थोड़े समय के लिए वह [विजय] टेस्ट, एकदिवसीय और ट्वेंटी20 के बीच फेरबदल की स्थिति में आकर असमंजस में आ गये थे” चोपड़ा कहते हैं। “वो सुनिश्चित नहीं थे की असल में वो क्या चाहते हैं, लेकिन अब उन्होंने दृढ़ता के साथ मन बना लिया है कि वह केवल एक टेस्ट खिलाड़ी हैं।”

“तो यह देखना दिलचस्प होगा। पांच से सात साल में, आपको खिलाड़ियों का एक और नया चरण देखने को मिल जायेगा। आपको ऐसे बल्लेबाज़ देखने को मिलेंगे जो टेस्ट और वनडे में समान रूप से सफल होंगे और जिन्हें टी20 मैच खेलने में भी कोई हिचक नहीं होगी।”

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